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आज से लगभग ४५० वर्ष पहले नर्मदा के पावन तट पर बसा हुआ तीर्थधाम चांदोद के चक्रपाणि घाट के ऊपर श्री रामानुज संप्रदायकी अहोबिल शाखा का वडगल परंपरा का धर्मचक्रोदय श्री श्रीवत्स मठ के अधीनस्थ गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में (५२) मंदिर है | कालांतर में उस समय के मंदिरो के देखरेख एवं उचित व्यवस्था का ध्यान में रखते हुए एक ट्रस्ट श्री भागवताचार्य नारायणाचार्य ट्रस्ट (श्री बी. एन. ट्रस्ट) का निर्माण हुआ| जिसमे ट्रस्ट के मुख्य स्थान पर श्री श्रीवत्सपीठ के गादीपति को स्थायीरूप से अधिकार दिया जाये ऐसा निर्णय हुआ| 

उसी परंपरा से श्री श्रीवत्सपीठ और श्री बी.एन.ट्रस्ट संचालित श्री वेंकटेश बालाजी मंदिर,वडोदरा के हृदय समान सुशोभित शहर के मध्य विस्तार में (ज्युबिलीबाग) के सामने शोभायमान है|
वैसे तो इस मंदिर का इतिहास लगभग २२५ वर्ष पुराना है| शहर के मध्य में अंदाज से ११००० स्वे.फिट. स्थान में स्थापित इस मंदिर का जीणोद्धार (नवीनकरण) २०१४ में वर्तमान गादीपति श्री वेंकटेशाचार्यजी ने अपने गुरुश्री अनिरुद्धाचार्यजी के संकल्प को ध्यान में रखते हुए मंदिर दक्षिण भारत की शिल्प पद्धति से निर्माण करवाया| इसके लिए आपश्रीने कुंभकोणम, पोंडिचेरी, चेन्नई से कारीगरों को बुलाकर निरंतर ८ महीने तक श्री रामानुज संप्रदाय का विशिष्टाद्वैत सिद्धांत के अनुसार गोपुरम् विमानम् (शिखर) और श्रीरामानुजाचार्यजी,जय विजय ,गोदाम्बादेवी, इत्यादि देवी - देवताओंका विग्रह (मूर्ति) तैयार करवाई| दक्षिणमे महाबलीपुराम् के भगवान श्री बालाजी की उत्सवमूर्ति (चलमूर्ति) का स्वरुप कुंभकोणम में तैयार हुआ| कांचीपुरम् से ५ रात्र आगम के १२ विद्वानों द्वारा श्री बालाजी भगवान की प्राणप्रतिष्ठा हुई| जिसमे देश विदेश से हजारो भक्तो सम्मिलित हुए| दक्षिण भारत की शैली से निर्मित इस मंदिर में संपूर्ण गुजरात में स्वयम् की अलग पहिचान हुई| इस ट्रस्ट द्वारा आधात्मिक धार्मिक एवं शैक्षणिक प्रवृति के अतिरिक्त सामाजिक एवं लोकहित कल्याणकारी प्रवृतियाँ निरंतर चालू है|

विविध उत्सवों में जैसे अन्नकूट महोत्सव, श्री गोदाम्बा एवं रंगनाथ का कल्याणोत्सव (विवाह), तथा धनुर्मास, श्री कृष्ण जन्माष्ठमी, रामनवमी, नृसिंह चतुर्दशी, वामन द्वादशी, एवं हिंडोला उत्सव विशेष रूप से मनाते है| दीपावली के समय सायंकाल नक्षत्र आरती, कुंभ आरती का दर्शन करने के लिए भक्तो की भारी भीड़ यहाँ उपस्थित होकर दर्शनों का लाभ प्राप्त करती है| 

बालाजी एवं श्री लक्ष्मीजी की प्रसन्नता के लिए हर शुक्रवार को चनाप्रसाद का भोग धराते है| तथा शनिवार को बालाजी के वार होने से बहुत सारे लोग दूर दूर से पगपाला चल कर शुक्रवार शनिवार को दर्शन करते है| अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भक्तलोग भगवान की १०८ प्रदक्षिणा भी करते है| 

अपनी संस्कारी नगरी वड़ोदरा में बिराजमान श्री तिरुपति बालाजी के दर्शन करने से श्री तिरुपति यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है| जो लोग तिरुपति श्री बालाजी का दर्शन करने के लिए जाने में असमर्थ है एवं घंटो तक लाइन में खड़े नहीं रह सकते है उन लोगो की सुविधा के लिए कृपा स्वरुप श्री बालाजी मंदिर वैकुण्ठ समान है|